तेनालीराम राजा – निशि

तेनालीराम ने एक बार राजा से यह वचन ले लिया था कि अगर कभी मुझसे कोई अपराध हो जाए तो फैसला करने के लिए पंचों का चुनाव मैं स्वयं ही करूंगा । महाराज ने वचन दे दिया । उन्हें पूरा विश्वास था कि तेनालीराम से कोई अपराध नहीं होगा और यह वचन, वचन ही रहेगा ।

किंतु कुछ दिनों बाद तेनालीराम ने हंसी-हंसी में कोई ऐसी बात कह दी जो महाराज की दृष्टि में अपराध था । उन्होंने तेनालीराम से कहा : ”तुम्हें तुम्हारी उद्दंडता के लिए दंड दिया जाएगा ।” ”ठीक है महाराज! किंतु महाराज को स्मरण होगा कि वे मुझे अपने किसी भी अपराध के लिए दण्ड देने के लिए पंच चुनने का अधिकार मुझे दे चुके हैं ।”

”हां याद है । तुम्हें पंच चुनने की आज्ञा है ।” तेनालीराम ने नगर के मजदूरों में से पांच आदमियों को चुन लिया । सब दरबारी और स्वयं महाराज भी तेनालीराम का चुनाव देखकर हैरान हो गए कि ये लोग भला क्या पंचायत करेंगे । खैर! पंचों को आसन दिए गए ।

इधर पंचों की प्रसन्नता का भी कोई अंत न था । जीवन में पहली बार उन्हें यह सम्मान और सौभाग्य मिला था । सारी बात सुनकर पंच आपस में सलाह मशवरा करने लगे । एक ने कहा, ”तेनालीराम ने राजा के सामने उद्दंडता दिखाई है । उस पर कम से कम बीस स्वर्ण मुद्राएं जुर्माना होना चाहिए ।”

दूसरे पंच को लगा कि बीस स्वर्ण मुद्राएं तो बहुत हैं । तेनालीराम ठहरा बाल-बच्चों वाला आदमी । वह बोला, ”नहीं भई, बीस तो बहुत होंगी । पन्द्रह स्वर्ण मुद्राएं ठीक हैं ।” तीसरे पंच ने कहा, ”पन्द्रह स्वर्ण मुद्राएं क्या कम होती हैं ? दस से अधिक स्वर्ण मुद्राओं का दंड देना अन्याय होगा ।”

चौथा कुछ अधिक ही दयावान था । बोला, ”आप लोग ही सोचिए हममें से किसी को दस स्वर्ण मुद्राओं का जुर्माना हो, तो हमारी क्या हालत होगी, इसलिए मेरी राय तो पांच की है ।” पांचवें ने कहा, ”पांच ठीक है । इतने में ही तेनालीराम की अक्ल ठिकाने आ जानी चाहिए ।

पांच स्वर्ण मुद्राओं के दंड का फैसला सुनकर राजा और सारे दरबारी दंग रह गए । उन्होंने स्वप्न में भी न सोचा था कि तेनालीराम इतना सस्ता छूट जाएगा । लेकिन हरेक का विचार था कि तेनालीराम की सूझबूझ इस बार भी काम कर गई ।